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Sonnet 4
75 days ago
by godpanrupesh
Sonnet 4 अरे लुटवैये ! यार मेरे व्यर्थ क्यूँ इसे गँवाते हो ? ख़ुद पर ही फ़ज़ूल क्यूँ ख़ज़ाना-ए-बेशक़ीमत लुटाते हो ? तरके 1 में न आई है ख़ुदा की नेमत कभी उधार है ये तुझपे क़र्ज़ बन जायेंगे कभी | मिलती है रहमत उनको जो ख़ुदा के क़रीन 2 हो अहले -दिल 3 हो जो अदम जो सबका रहीम हो | तो बे -जा 4 न कर, ऐ सूम ...
नज़्म - ए- रूप - nazmeroop.wordpress.com
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